Wednesday, February 15, 2017

“ग़ालिब” की १४८ वीं पुण्यतिथि

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  आज मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” की १४८ वीं पुण्यतिथि है | इस मौके पर पेश है उनकी एक ग़ज़ल जो मुझे बेहद पसंद है |

दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब

दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या

बे-नियाज़ी[2] हद से गुज़री, बन्दा-परवर[3] कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'

हज़रत-ए-नासेह[4] गर आएं, दीदा-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह[5]
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझायेंगे क्या

आज वां तेग़ो-कफ़न[6] बांधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र[7] मेरा क़त्ल करने में वो अब लायेंगे क्या

गर किया नासेह[8] ने हम को क़ैद अच्छा! यूं सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अन्दाज़ छुट जायेंगे क्या

ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़[9] हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां[10] से घबरायेंगे क्या

है अब इस माअ़मूरा[11] में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त[12] 'असद'
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या

शब्दार्थ:
  1. सहायता
  2. उपेक्षा
  3. मालिक, रखवाला
  4. महान उपदेशक
  5. आँखें और दिल रस्ते में गलीचे की तरह बिछ जाएगें
  6. तलवार और कफ़न
  7. प्रशन उठाना, ना-नुकर करना
  8. उपदेशक
  9. जु्ल्फ़ों के कैदी
  10. कैदखाना
  11. नगर
  12. प्रेम के दुखों का अकाल

Sunday, January 1, 2017

यकुम जनवरी है, नया साल है

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"यकुम जनवरी है, नया साल है,
दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है !?"
- अमीर क़ज़लबाश

यकुम = first/पहला

Friday, July 22, 2016

"वो कमरा बात करता था ..."

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आज से ठीक १९ साल पहले मैं कल्कत्ते से मैनपुरी आया था ... तब से यही हूँ ... पैदाइश के बाद के २० साल कलकत्ता मे गुजारने के बाद मैनपुरी आना और यहाँ आ कर दोबारा ज़िंदगी को एक नए सिरे से शुरू करना सहज न था ... आज भी नहीं हैं |

जावेद अख़्तर साहब की यह नज़्म जब मैंने पढ़ी तो लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गई हो ... सच मे आज भी जब कभी अकेला बैठा सोचता हूँ तो कल्कत्ते वाले उस फ्लॅट का मेरा वो कमरा बहुत याद आता है ... "वो कमरा बात करता था |"

मै जब भी जिंदगी की चिलचिलाती धुप में तपकर
मै जब भी दूसरों के और अपने झूट से थककर
मै सबसे लड़ के खुद से हार के
जब भी उस एक कमरे में जाता था
वह हल्के और गहरे कत्थई रगों का एक कमरा
वो बेहद मेहरबा कमरा
जो अपनी नरम मुट्ठी में मुझे
ऐसे छुपा लेता था जैसे
कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डांटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे-मारे घूमते हो तुम
वो कमरा याद आता है
दबीज़ और खासा भरी
कुछ जरा मुश्किल से खुलने वाला
वो शीशम का दरवाजा
की जैसे कोई अक्खड बाप
अपने खुरदुरे सीने में
शफ़कत के समुन्दर को छुपाए हो
वो कुर्सी
और उसके साथ वो जुड़वाँ बहने उसकी
वो दोनों दोस्त थी मेरी
वो एक गुस्ताख मुहफट आईना
जो दिल का अच्छा था
वो बेहंगम-सी अलमारी
जो कोने में खड़ी
इक बूढ़ी अन्ना की तरह
आईने को तनवीह करती थी
वो एक गुलदान
नन्हा सा
बहुत शैतान
उन दोनों पे हसता था
या जहानत से भरी एक मुस्कराहट
और दरीचे पर झुकी वो बेल
कोई सब्ज सरगोशी
किताबे
ताक में और शेल्फ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठी
मगर सब मुन्तजिर इस बात की
मै उनसे कुछ पुछु
सरहाने, नींद का साथी
थकन का चारागार
वो नर्म-दिल तकिया
मै जिसकी गोद में सर रखके
छत को देखता था
छत की कड़ियों में
न जाने कितने अफसानों की कड़ियाँ थी
वो छोटी मेज पर
और सामने दीवार पर आवेज़ा तस्वीरे
मुझे अपनाइयत और यकी से देखती थी
मुस्कुराती थी
उन्हें शक भी नहीं था, एक दिन
मै उनको ऐसे छोड जाऊंगा
मै एक दिन यु भी जाऊँगा
की फिर वापस न आऊंगा
मै अब जिस घर में रहता हू
बहुत ही खूबसूरत है
मगर अक्सर यहाँ खामोश बैठा
वो कमरा बात करता था
-जावेद अख्तर

Tuesday, May 17, 2016

ताबीज़ जैसा था वो शख्स

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"ताबीज़ जैसा था वो शख्स;
गले लगते ही सुकूँ मिलता था!"
- अज्ञात

Sunday, May 8, 2016

माँ दिवस पर विशेष

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 माँ 
बेसन की सौधी रोटी पर
खट्टी चटनी - जैसी माँ
याद आती है चौका - बासन
चिमटा , फुकनी - जैसी माँ ||

बान की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दोपहरी - जैसी माँ ||

चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा - मोहन , अली - अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुण्डी - जैसी माँ ||

बीवी , बेटी , बहन , पडोसन
थोडी - थोडी सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी - जैसी माँ ||

बाँट के अपना चहेरा , माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक एल्बम में
चंचल लड़की - जैसी माँ ||

----- निदा फाजली .

Monday, October 12, 2015

जन्मदिन मुबारक निदा साहब

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नील गगन पर बैठ
कब तक
चाँद सितारों से झाँकोगे

पर्वत की ऊँची चोटी से
कब तक
दुनिया को देखोगे

आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में
कब तक
आराम करोगे

मेरा छप्पर टपक रहा है
बनकर सूरज
इसे सुखाओ

खाली है
आटे का कनस्तर
बनकर गेहूँ
इसमें आओ

माँ का चश्मा
टूट गया है
बनकर शीशा
इसे बनाओ

चुप-चुप हैं आँगन में बच्चे
बनकर गेंद
इन्हें बहलाओ

शाम हुई है
चाँद उगाओ
पेड़ हिलाओ
हवा चलाओ

काम बहुत हैं
हाथ बटाओ अल्ला मियाँ
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियाँ...!

- निदा फ़ाज़ली
जन्मदिन मुबारक निदा साहब !!

Saturday, June 27, 2015

शेरो शायरी क्या है !?

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"तर्के-मय को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना;
इतनी पी चुका हूँ के और पी नहीं जाती!!
शेरो शायरी क्या है सब उसी का चक्कर है;
वो कसक जो सीने से आज भी नहीं जाती!!"
- मौलाना हारून 'अना' क़ासमी