Friday, July 22, 2016

"वो कमरा बात करता था ..."

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आज से ठीक १९ साल पहले मैं कल्कत्ते से मैनपुरी आया था ... तब से यही हूँ ... पैदाइश के बाद के २० साल कलकत्ता मे गुजारने के बाद मैनपुरी आना और यहाँ आ कर दोबारा ज़िंदगी को एक नए सिरे से शुरू करना सहज न था ... आज भी नहीं हैं |

जावेद अख़्तर साहब की यह नज़्म जब मैंने पढ़ी तो लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गई हो ... सच मे आज भी जब कभी अकेला बैठा सोचता हूँ तो कल्कत्ते वाले उस फ्लॅट का मेरा वो कमरा बहुत याद आता है ... "वो कमरा बात करता था |"

मै जब भी जिंदगी की चिलचिलाती धुप में तपकर
मै जब भी दूसरों के और अपने झूट से थककर
मै सबसे लड़ के खुद से हार के
जब भी उस एक कमरे में जाता था
वह हल्के और गहरे कत्थई रगों का एक कमरा
वो बेहद मेहरबा कमरा
जो अपनी नरम मुट्ठी में मुझे
ऐसे छुपा लेता था जैसे
कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डांटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे-मारे घूमते हो तुम
वो कमरा याद आता है
दबीज़ और खासा भरी
कुछ जरा मुश्किल से खुलने वाला
वो शीशम का दरवाजा
की जैसे कोई अक्खड बाप
अपने खुरदुरे सीने में
शफ़कत के समुन्दर को छुपाए हो
वो कुर्सी
और उसके साथ वो जुड़वाँ बहने उसकी
वो दोनों दोस्त थी मेरी
वो एक गुस्ताख मुहफट आईना
जो दिल का अच्छा था
वो बेहंगम-सी अलमारी
जो कोने में खड़ी
इक बूढ़ी अन्ना की तरह
आईने को तनवीह करती थी
वो एक गुलदान
नन्हा सा
बहुत शैतान
उन दोनों पे हसता था
या जहानत से भरी एक मुस्कराहट
और दरीचे पर झुकी वो बेल
कोई सब्ज सरगोशी
किताबे
ताक में और शेल्फ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठी
मगर सब मुन्तजिर इस बात की
मै उनसे कुछ पुछु
सरहाने, नींद का साथी
थकन का चारागार
वो नर्म-दिल तकिया
मै जिसकी गोद में सर रखके
छत को देखता था
छत की कड़ियों में
न जाने कितने अफसानों की कड़ियाँ थी
वो छोटी मेज पर
और सामने दीवार पर आवेज़ा तस्वीरे
मुझे अपनाइयत और यकी से देखती थी
मुस्कुराती थी
उन्हें शक भी नहीं था, एक दिन
मै उनको ऐसे छोड जाऊंगा
मै एक दिन यु भी जाऊँगा
की फिर वापस न आऊंगा
मै अब जिस घर में रहता हू
बहुत ही खूबसूरत है
मगर अक्सर यहाँ खामोश बैठा
वो कमरा बात करता था
-जावेद अख्तर

Tuesday, May 17, 2016

ताबीज़ जैसा था वो शख्स

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"ताबीज़ जैसा था वो शख्स;
गले लगते ही सुकूँ मिलता था!"
- अज्ञात

Sunday, May 8, 2016

माँ दिवस पर विशेष

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 माँ 
बेसन की सौधी रोटी पर
खट्टी चटनी - जैसी माँ
याद आती है चौका - बासन
चिमटा , फुकनी - जैसी माँ ||

बान की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दोपहरी - जैसी माँ ||

चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा - मोहन , अली - अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुण्डी - जैसी माँ ||

बीवी , बेटी , बहन , पडोसन
थोडी - थोडी सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी - जैसी माँ ||

बाँट के अपना चहेरा , माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक एल्बम में
चंचल लड़की - जैसी माँ ||

----- निदा फाजली .

Monday, October 12, 2015

जन्मदिन मुबारक निदा साहब

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नील गगन पर बैठ
कब तक
चाँद सितारों से झाँकोगे

पर्वत की ऊँची चोटी से
कब तक
दुनिया को देखोगे

आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में
कब तक
आराम करोगे

मेरा छप्पर टपक रहा है
बनकर सूरज
इसे सुखाओ

खाली है
आटे का कनस्तर
बनकर गेहूँ
इसमें आओ

माँ का चश्मा
टूट गया है
बनकर शीशा
इसे बनाओ

चुप-चुप हैं आँगन में बच्चे
बनकर गेंद
इन्हें बहलाओ

शाम हुई है
चाँद उगाओ
पेड़ हिलाओ
हवा चलाओ

काम बहुत हैं
हाथ बटाओ अल्ला मियाँ
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियाँ...!

- निदा फ़ाज़ली
जन्मदिन मुबारक निदा साहब !!

Saturday, June 27, 2015

शेरो शायरी क्या है !?

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"तर्के-मय को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना;
इतनी पी चुका हूँ के और पी नहीं जाती!!
शेरो शायरी क्या है सब उसी का चक्कर है;
वो कसक जो सीने से आज भी नहीं जाती!!"
- मौलाना हारून 'अना' क़ासमी

Sunday, June 21, 2015

तुम मुझमें जिंदा हो ...

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श्री नन्दन मिश्रा
( 28/07/1936 - जब तक मैं हूँ )
पिता
तुम्हारी क्रब पर मैं फातिया पढ़ने नहीं आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नहीं सकते,
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर, जिसने उड़ाई थी
वह झूठा था, वह झूठा था।
वह तुम कब थे,
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था।
मेरी आखें मंजरों में कैद है अब तक,
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ वह वही हैं,
जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी,
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी अंगुलियों में सांस लेते हैं।
मैं लिखने के लिये जब कलम कागज उठाता हू
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी पे पाता हूँ
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वह तुम्हारी लग़जिषों-ऩाकामियों के साथ बहता हैं।
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जहन रहता हैं।
मेरी बीमारियों में तुम, मेरी लाचारियों में तुम।
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा था,
वह झूठा था, वह झूठा था,
तुम्हारी क्रब में मैं दफन हूँ, तुम मुझमें जिंदा हो।
कभी फुरसत मिले तो फातिया पढ़ने चले आना।
-निदा फाज़ली

Tuesday, July 22, 2014

"वो कमरा बात करता था |"

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आज से ठीक १७ साल पहले मैं कल्कत्ते से मैनपुरी आया था ... तब से यही हूँ ... पैदाइश के बाद के २० साल कलकत्ता मे गुजारने के बाद मैनपुरी आना और यहाँ आ कर दोबारा ज़िंदगी को एक नए सिरे से शुरू करना सहज न था ... आज भी नहीं हैं |

जावेद अख़्तर साहब की यह नज़्म जब मैंने पढ़ी तो लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गई हो ... सच मे आज भी जब कभी अकेला बैठा सोचता हूँ तो कल्कत्ते वाले उस फ्लॅट का मेरा वो कमरा बहुत याद आता है ...  

"वो कमरा बात करता था |"

मै जब भी जिंदगी की चिलचिलाती धुप में तपकर
मै जब भी दूसरों के और अपने झूट से थककर
मै सबसे लड़ के खुद से हार के
जब भी उस एक कमरे में जाता था
वह हल्के और गहरे कत्थई रगों का एक कमरा
वो बेहद मेहरबा कमरा
जो अपनी नरम मुट्ठी में मुझे
ऐसे छुपा लेता था जैसे
कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डांटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे-मारे घूमते हो तुम
वो कमरा याद आता है

दबीज़ और खासा भरी
कुछ जरा मुश्किल से खुलने वाला
वो शीशम का दरवाजा
की जैसे कोई अक्खड बाप
अपने खुरदुरे सीने में
शफ़कत के समुन्दर को छुपाए हो
वो कुर्सी
और उसके साथ वो जुड़वाँ बहने उसकी
वो दोनों दोस्त थी मेरी
वो एक गुस्ताख मुहफट आईना
जो दिल का अच्छा था
वो बेहंगम-सी अलमारी
जो कोने में खड़ी
इक बूढ़ी अन्ना की तरह
आईने को तनवीह करती थी
वो एक गुलदान
नन्हा सा
बहुत शैतान
उन दोनों पे हसता था
या जहानत से भरी एक मुस्कराहट
और दरीचे पर झुकी वो बेल
कोई सब्ज सरगोशी
किताबे
ताक में और शेल्फ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठी
मगर सब मुन्तजिर इस बात की
मै उनसे कुछ पुछु
सरहाने, नींद का साथी
थकन का चारागार
वो नर्म-दिल तकिया
मै जिसकी गोद में सर रखके
छत को देखता था
छत की कड़ियों में
न जाने कितने अफसानों की कड़ियाँ थी
वो छोटी मेज पर
और सामने दीवार पर आवेज़ा तस्वीरे
मुझे अपनाइयत और यकी से देखती थी
मुस्कुराती थी
उन्हें शक भी नहीं था, एक दिन
मै उनको ऐसे छोड जाऊंगा
मै एक दिन यु भी जाऊँगा
की फिर वापस न आऊंगा
मै अब जिस घर में रहता हू
बहुत ही खूबसूरत है
मगर अक्सर यहाँ खामोश बैठा
वो कमरा बात करता था
-जावेद अख्तर