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Thursday, December 27, 2018

मिर्ज़ा गालिब की २२१ वीं जयंती पर विशेष

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दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब
दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या

बे-नियाज़ी[2] हद से गुज़री, बन्दा-परवर[3] कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'

हज़रत-ए-नासेह[4] गर आएं, दीदा-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह[5]
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझायेंगे क्या

आज वां तेग़ो-कफ़न[6] बांधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र[7] मेरा क़त्ल करने में वो अब लायेंगे क्या

गर किया नासेह[8] ने हम को क़ैद अच्छा! यूं सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अन्दाज़ छुट जायेंगे क्या

ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़[9] हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां[10] से घबरायेंगे क्या

है अब इस माअ़मूरा[11] में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त[12] 'असद'
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या

शब्दार्थ:
  1. ↑ सहायता
  2. ↑ उपेक्षा
  3. ↑ मालिक, रखवाला
  4. ↑ महान उपदेशक
  5. ↑ आँखें और दिल रस्ते में गलीचे की तरह बिछ जाएगें
  6. ↑ तलवार और कफ़न
  7. ↑ प्रशन उठाना, ना-नुकर करना
  8. ↑ उपदेशक
  9. ↑ जु्ल्फ़ों के कैदी
  10. ↑ कैदखाना
  11. ↑ नगर
  12. ↑ प्रेम के दुखों का अकाल
हैप्पी बर्थड़े चचा ग़ालिब

Wednesday, February 15, 2017

“ग़ालिब” की १४८ वीं पुण्यतिथि

3 comments
  आज मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” की १४८ वीं पुण्यतिथि है | इस मौके पर पेश है उनकी एक ग़ज़ल जो मुझे बेहद पसंद है |

दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब

दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या

बे-नियाज़ी[2] हद से गुज़री, बन्दा-परवर[3] कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'

हज़रत-ए-नासेह[4] गर आएं, दीदा-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह[5]
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझायेंगे क्या

आज वां तेग़ो-कफ़न[6] बांधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र[7] मेरा क़त्ल करने में वो अब लायेंगे क्या

गर किया नासेह[8] ने हम को क़ैद अच्छा! यूं सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अन्दाज़ छुट जायेंगे क्या

ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़[9] हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां[10] से घबरायेंगे क्या

है अब इस माअ़मूरा[11] में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त[12] 'असद'
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या

शब्दार्थ:
  1. ↑ सहायता
  2. ↑ उपेक्षा
  3. ↑ मालिक, रखवाला
  4. ↑ महान उपदेशक
  5. ↑ आँखें और दिल रस्ते में गलीचे की तरह बिछ जाएगें
  6. ↑ तलवार और कफ़न
  7. ↑ प्रशन उठाना, ना-नुकर करना
  8. ↑ उपदेशक
  9. ↑ जु्ल्फ़ों के कैदी
  10. ↑ कैदखाना
  11. ↑ नगर
  12. ↑ प्रेम के दुखों का अकाल

Saturday, February 15, 2014

चचा ग़ालिब की १४५ वीं पुण्यतिथि पर विशेष

2 comments
आज मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” की १४५ वीं पुण्यतिथि है | इस मौके पर पेश है उनका एक शेर जो मुझे बेहद पसंद है |

"हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है"

Friday, December 27, 2013

मिर्ज़ा गालिब की २१६ वीं जयंती पर विशेष

2 comments
दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब

दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या

बे-नियाज़ी[2] हद से गुज़री, बन्दा-परवर[3] कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'

हज़रत-ए-नासेह[4] गर आएं, दीदा-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह[5]
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझायेंगे क्या

आज वां तेग़ो-कफ़न[6] बांधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र[7] मेरा क़त्ल करने में वो अब लायेंगे क्या

गर किया नासेह[8] ने हम को क़ैद अच्छा! यूं सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अन्दाज़ छुट जायेंगे क्या

ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़[9] हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां[10] से घबरायेंगे क्या

है अब इस माअ़मूरा[11] में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त[12] 'असद'
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या

शब्दार्थ:
  1. ↑ सहायता
  2. ↑ उपेक्षा
  3. ↑ मालिक, रखवाला
  4. ↑ महान उपदेशक
  5. ↑ आँखें और दिल रस्ते में गलीचे की तरह बिछ जाएगें
  6. ↑ तलवार और कफ़न
  7. ↑ प्रशन उठाना, ना-नुकर करना
  8. ↑ उपदेशक
  9. ↑ जु्ल्फ़ों के कैदी
  10. ↑ कैदखाना
  11. ↑ नगर
  12. ↑ प्रेम के दुखों का अकाल
हैप्पी बर्थड़े चचा गालिब

Monday, October 29, 2012

ज़िन्दगी का फलसफा

1 comments
दोस्तों, आज तक आप सब को मिर्ज़ा गालिब के शे'र पढ़वाता आया हूँ आज उनके हिसाब से ज़िन्दगी का जो फलसफा है वो आप सब की पेश ए नज़र है ... 
बक़ौल चचा गालिब,
" सुनो साहब, जिस शख़्स को जिस शगल का ज़ौक़ हो और वो उसमे बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे ... उसका नाम ऐश है !! "

Thursday, October 11, 2012

कलकत्ते का ज़िक्र

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मिर्ज़ा गालिब साहब का यह शेर तो मेरे दिल के बहुत करीब है ... क्यूँ कि इस मे मेरी जन्मभूमि का जिक्र है !

"कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये"
- मिर्ज़ा गालिब

Monday, October 8, 2012

बुरा न मान ...

16 comments
जब जब बात शेर ओ शायरी की होती है जो नाम सब से पहले जहन मे आता है ... वो है ... मिर्ज़ा गालिब का ... 

मुझे उनका यह शेर सब से ज्यादा पसंद है ... 


'ग़ालिब ' बुरा ना मान जो वाइज बुरा कहे ...
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहे जिसे ???