Tuesday, October 9, 2012

मैं और मिरी आवारगी

आज आप सब को मैं अपने एक और पसंदीदा शायर जावेद अख़्तर साहब के एक शेर से रूबरू करवाता हूँ !

"  फिरते हैं कब से दर-बदर अब इस नगर अब उस नगर
इक दूसरे के हमसफ़र मैं और मिरी आवारगी "

5 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

क्या बात है
धन्यवाद शिवम जी

शिवम् मिश्रा said...

शुक्रिया :)

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत मज़ा आ रहा है शिवम् यहाँ . एक से बढ़ के एक शेर निकाल रहे हो अपने खजाने से..बधाई.

शिवम् मिश्रा said...

शुक्रिया :)

Johny Samajhdar said...

बहुत ही बढ़िया पढ़ कर आनंद आ गया | क्या शेर कहा है - लाजवाब
तमाशा-ए-ज़िन्दगी

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